An online documentation of the khojis' learnings and doings.

Archive for the ‘Arts’ Category

Posters and web design by Nikhil

In Jan/Feb 2013 I had done an online internship: I assisted Helena Norberg-Hodge and her team in organising for the Economics of Happiness Conference that took place in March-2013 in Byron Bay, Australia. Click here to see some amazing talks and sessions that happened there. The conference, and the work of its organizers (ISEC), revolves around promoting localization of economies, healthier and happier lives, ecological balance, social justice and many more themes.
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Aside

Poem by Rahul 5 एक तम…

एक तमाशा सा चल रहा है
इन दिनों वतन में
जिसे देखो अपनी पूड़ियाँ
तल रहा है वतन में
सूबा कोई लथपथ हो चला है खून में

संसद में जूता चल रहा है वतन में
बिहारी,मराठी, हिन्दू, मुस्लिम
जाने क्या क्या क्या जल रहा है वतन में
किसान पानी में प्रदर्शन करते हैं
नेता ए सी में चल रहा है वतन में
फिर कोई नै खबर तलाशते हैं लोग
पुराना मुद्दा फिसल रहा है वतन में
तेरी तशरीफ़ तू ही बचा…
अपना तो मस्त चल रहा है वतन में…

Poem by Rahul 4

तुम्हारे ख्वाब की कीमत क्या हैं…

और इसके ख्वाब की, उसके ख्वाब की…
हम सब के ख्वाब की, जो जवान हैं उन्हें हकीकत का अंदाज़ा नहीं हैं
और जो बूढ़े हैं वो हार मान चुके हैं, जमाना ऐसे ही चलता हैं…
जो सजा हमने भुगती उससे बदतर सजा हमारे आने व
ाली पीढ़ी भुगतेगी

हम सब इसका ही तो इंतज़ाम कर रहे हैं

हममे कोई गुस्सा नहीं हैं, कोई आवाज़ नहीं हैं, किसी आवाज़ देने वाले के हम साथ नहीं हैं…

ऐसा लगता हैं हम ख़ामोशी से हमारी ही मौत का इंतज़ार कर रहे हैं
हाँ हमारी ही मौत का…
तुम्हारी, इनकी, उनकी, मेरी, हम सब की मौत का…

Poem by Rahul 3

आओ बेटियो, आओ बेटियो

स्याह सदी के कफ़न से,इस अंधे चमन से
हर सैलाबे घुटन से बाहर आओ बेटियो ,
ऐलान-ऐ-ख़ुदी का अब दौर आ गया है।

आँचल में सिसको न छुप-छुप जियो
सर उठा के फ़ख्र से तुम जियो बेटियो ,
अब जिल्लत की रुख़सत का दौर आ गया है।

हर घर की लाली, हो फूलों की डाली
बन ख़ुशबू फिज़ाओं में घुल जाओ बेटियो ,
घर-आँगन को महकाने का दौर आ गया है।

भुला बुर्के की चोट, हटा घूंघट की ओट
हिला ज़ुबाँ-ओ-होंठ आवाज उठाओ बेटियो ,
एक नई दुनिया बनाने का दौर आ गया है।

हटेंगी सलाख़ें, टूट जायेंगी बेड़ियाँ
बन खुद लौहार ये ज़ंजीरें पिंघलाओ बेटियो ,
लौह के मौम हो जाने का दौर आ गया है।

सब दीवारें गिरीं, मिट गये फासले
आज बेटों सी तुम हो गई हो बेटियो ,
रिसते घावों के भरने का दौर आ गया है।

ये ज़मीं कह रही है, आसमाँ कह रहा है
बॉंहे फैलाये ज़म़ाना कहे आओ बेटियो ,
तुम्हें सीने से लगाने की जी चाह गया है।

आओ बेटियो, आओ बेटियो ……….

Poem by Rahul 2

और न जाने किस गफलत में हम गुम हैं…

हममे से अधिकतर जवान लड़के-लडकियां ये ख्याल रखते हैं की राजनीती उनके लिए नहीं हैं उनकी जिन्दगी तो इक खुबसूरत नोकरी करते हुए बितनी चाहिए जिसमे वो शनिवार और रविवार की खुबसूरत छुट्टियां बिता सके पैसे की कोई कमी नहीं हो और हम आराम से अपनी जिन्दगी बिता सके,

मगर मैं पूछना चाहता हूँ उनसे जिन्होंने अपनी पढाई पूरी करली हैं क्या उनको ऐसी जिन्दगी मिल गई हैं ?

और क्या जो पढ़ रहे हैं उनको ऐसी जिन्दगी मिल जाएगी…

बुरा मत मानना मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ में खुद भी तुम्हारे लिए यही चाहता हूँ मगर ये तुम्हारे ख्वाब हैं और ये पुरे नहीं हो सकते मैं तुम्हे ये हकीक़त बताना चाहता हूँ हमारे मुल्क की सियासत ने हमें उन हालातो में ला खड़ा किया हैं जहां से अगर हम नहीं निकले तो हम हमारा अस्तित्व ही खो देंगे…

आज जरुरत हैं हम हमारे मुल्क की नई इबारत लिखे और ये हम सबको मिलकर लिखनी होंगी, हमें इसलिए राजनीती नहीं करनी हैं के हमें बड़े पद मिल जाये बल्कि हम अपने वतन से मुहब्बत करते हैं और वतन की बेहतरी के लिए राजनीती करनी हैं…..

और अगर हम नहीं करेंगे तो अंजाम हम सबको मालूम हैं

Aside

Poem by Rahul 1 और जब

और जब मुझसे ये कहा गया…

के मेरी कोई पहचान नहीं हें,
और इस दुनिया में कोई मेरा भरोसा नहीं करेगा
और हद से हद
जब मेरे लोगो ने इस बात पे भरोसा कर
मेरा साथ छोड़ने में ही भलाई समझी
तो यकीन मानना

मुझे जिन्दगी का एक और
बेहतरीन मकसद मिल गया

 
rahul….

Hymn from the Thin

Inline image 1
Friends, Healthy Dames, Lend me your fat,
For I am too thin and that’s a fact!

My body disposes of every nutrition thrown at it
I’ve been called Skeletor and sometimes I really look like it

All those great-looking body-hugging tees, they melt my heart
Though if I put one on, I certainly won’t look the part!

I can’t feel my hands and feet in winters cold
While upon me many times my shirt will fold

When I stuff in more food to balance my BMI,
The signs aren’t good, like floating interest on an EMI

My system suddenly reacts, disposes of the excess mass.
In forms of solids, liquids and, well, even Gas!

While most humans can stay afloat in water high enough to gulp air,
My Low-Vol, HD physique makes me sink like a wreck in the seas of despair.

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Poem: Ripened mangoes remind me of summer

Ripened mangoes
Remind me of summer
Its long afternoons
Siestas under thin sheets
Whirling fans overhead.
Long midsummer afternoons
Remind me of childhood
Its golden sparkle
Story-tales being spun
Under leafy banyan trees.
Of dust—many feet kicking it up
As they played cricket.
Childhood, indeed
Reminds me of mangoes
Their sweet, warm smell
After long heavy meals with cousins.
There was always space
For just one more.
One more mango.
One more siesta.
One more, one last story.
One more childhood.

Poem: Is hope a good thing?

What is that which binds me to you?
A bond so taut it cuts my fingers
You don’t hold it from your end
You don’t even acknowledge it exists.
Is it a noose around your neck that I have placed?
Do you wish to be free?

Is hope a good thing?

Why does the world spin on a tilted axis?
Why do camels walk in the rain,
While fertile lands crack with thirst?
Is hope a good thing?

Or maybe it’s my imagination
Gives me dreams to sustain
Like a crack from which a shaft of light escapes
Into that abysmal hole of loneliness
What is the difference between hope and false hope?
Is there any?
Tell me,
Is hope a good thing?

But what will you answer?
You, the shredder of quilted hopes
And burner of combustible desires
They flare up so fast and leave nothing but smoke behind
Polluting, suffocating, poisonous fumes.
Is hope a good thing?

But what will you answer?

Poem: Rahul ki shayari -1

चल इक पुराना इश्तिहार छापे
“इन्कलाब जिंदाबाद” अख़बार छापे

तुम तो मस्त हो जाओगे अपनी दुनिया में
किसी तड़पते हुए का ऐतबार छापे

गरीब, मजलूम, गमजदा, बेसहारा
उनकी टूटती उम्मीदों का इंतज़ार छापे

हाकिम का हंटर इंतज़ार में हे हर वक़्त
के कब कोई बगावत को हकदार छापे

हर जुल्मो-सितम की परवाज़ बहुत छोटी हे
कोई तो हक से पेगामे-परवरदिगार छापे….

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