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From rahul karanpuriya


India

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– rahul

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दोहरे चरित्र की सच में क्या परिभाषा है
जैसी सारे राजनितिक नेताओं की अभिलाषा है

समर्थन देना लेना बाएं हाथ का खेल है
देशवासियों में फैली चाहे कितनी भी निराशा है

वो करते हैं और करेंगे अपनी मनमानियाँ
गिरना बचना सरकारों का अब रोज़ का तमाशा है

प्रश्न है कैसे जाएगा देश हमारा शिखर पर
नदियाँ बहती थीं दूध की अब तो यह कर्मनाशा है

किसी का ‘हाथ’ किसी की ‘सवारी’ आम जन की…. (चुनाव-चिन्ह)
गरीबों की जेब को इन सबने मिलकर ही तराशा है

खिलता है कहाँ ‘कमल’ कहाँ जलती है ‘लालटेन’
जिसकी आती बारी बजाता वही ढोल और ताशा है

मिलकर लूटना देश को यही एक उद्देश्य है अब
आरोप प्रत्यारोप लगाना यही एक इनकी भाषा है

condition of so called educated world..

लैपटॉप कंधे पर लटकाए वो चला है घर को, रोज़ की कैद है.. रोज़ की रिहाई है.. उंगलीओं को इश्क हो चला है, अब की-बोर्ड के बटनों से.. जेब में पड़ी वो कलम.. ज़रा से कागज़ को तरसती है.. कप के तले में बची, वो ज़रा सी चाय.. होठों की उस पहली सी वफ़ा को तरसती है.. और एक आइना है घर में.. जाने किस चेहरे को तरसता है… 😉

इस मुल्क में…………वो ग़रीब ही रह गया,
जिसकी तक़्दीर में न था, सरकार का दामाद होना !

rahul poem no.6

 

दोस्तो आज के वर्तमान राजनीतिक स्थिति को उजागर करने की कोशिस इस रचना के माध्यम से की है…आपका सहयोग और विचार अपेक्षित है …….

राजनीति की इस दौर में, बस इतनी परिभाषा है ,
लूट सको तो उतना लूटो, जिसकी जितनी आशा है,

हम पढ़ लिख कर गँवार, जाहिल, बेवकूफ कहलायेंगे,
ये अंगूठा छाप जाकर भी सत्ता में नेता जी बन जाएँगे,

बोफोर्स, सिलेंडर, कोयला, 2जी, किसको भी नहीं छोड़ा है,
जिस जिस कुर्सी पर ये बैठे एक-एक कर के तोड़ा है,

नहीं ज़मीर इनका कुछ कहता जब करते मजहब से खिलवाड़,
और बार-बार टीवी पर आ कहते “हो रहा भारत निर्माण”,

हमनें नेता जी से पूछा- क्यों तुम हो इतने अवसरवादी,
नेता जी सीना तान कहें- लेकिन पहना तो हूँ खादी,

रहा लड्पन्न अब तक हममें,अब तो उम्र दिखाएँगे ,
जिधर भी देखें नेता जिसको, चोर-चोर चिल्लाएँगे,

अबकी बार तुम आना वोट मांगने हाथों से,
पहले समझाएँगे मुँह से,फिर बतलाएंगे लातों से

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